ई प्यार के मौसम
ई प्यार के मौसम है,
मनवा सीतल और चंचल है।
वन-उपवन सब सजल है,
आज मनवा कितना चंचल है।
भोर के किरनिया से पहले,
जाग जाला टिटहरी पहले।
अपने प्रियेशी के विरह में,
चिरई के वेदना छलकत रहे।
ई प्यार के मौसम में,
मनवा सीतल और चंचल भेल।
कैय जादू कर मरालक,
मनवा आज बस में न रहले।
प्रीतम के मिलन के पल,
याद आवे हमरा पल-पल।
ओकर मुस्कत चेहरा,
वेरी-वेरी सतावे।
ई विरह की वेदना, हाय!
केकरो से कहले न कहावे।
गांव के पोखरिया जहां,
रोज मिले आवे।
बात करत-करत,
घंटो बित जा हले।
रूप श्रृंगार मोहनी जैसन,
लागे चेहरा चांद नियन।
कसम खेले रहली,
साथ जिए मरे के।
ई प्यार के मौसम में,
मनवा सीतल और चंचल भेल।
✍️ कार्तिक कुसुम यादव
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